गुड़ से दोस्ती तो गुलगुले से परहेज क्यों
हरहर शम्भू चौधरी (मुख्य संपादक)
आपने अक्सर यह देखा, पढ़ा और सूना होगा की फंला तहसील, या फलां नगरपालिका / नगर निगम द्वारा प्लास्टिक की थैलियाँ उपयोग की जाने वाली दुकानदारों पर कार्यवाही कर उनसे जुर्माना वसुला।
ताजा घटना ओडिशा में सुन्दरगढ़ जिला अंतर्गत आनेवाले राजगांगपुर की है। जहाँ प्लास्टिक निर्मित सामग्रियों और प्लास्टिक की थैलियों के लिए स्थानीय नगरपालिका द्वारा छापामारी की गई और जिनके पास से उक्त सामग्री बरामद हुई उनसे जुर्माना वसुला गया।
यहाँ प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति अपनी जीविकोपार्जन के लिए व्यवसाय को अपनाता है और उसने उस सामग्री का व्यवसाय किया जिसकी मांग बाजार में दिन प्रतिदिन बढ़ रही है और वह गैरकानूनी भी नही है तो उसने ऐसा क्या गुनाह कर दिया कि उससे जुर्माना वसुला गया। कहने का तात्पर्य यह है कि प्लास्टिक का व्यवसाय को गलत ठहराया जाना या इस पर रोक लगाने के लिए चुनिंदा उत्पादो को चिन्हित करना कहाँ तक उचित है।
जबकि आज की सच्चाई यह है कि खाद्य पदार्थ हो या मेवे, मिठाईयाँ यहाँ तक की फल,शब्जियाँ,अनाज भी भरने के लिए प्लास्टिक से बने ट्रे, थैली,बोरे जैसी प्लास्टिक निर्मित चीजो का उपयोग किया जा रहा है।
कुर्सी, मेज, कलम, मोबाइल, हो या बिस्कुट, स्नैक्स,की पैकिंग हो या पानी की बोतल सभी चीजें प्लास्टिक की बनी होती है। और ये सभी चीजें उपयोग करने के बाद यहाँ वहाँ फेंक दी जाती है, जिससे एक प्रदूषित वातावरण की शृष्टी होती है।
ऐसे में केवल प्लास्टिक की थैलियो,गिलास और कप के उपयोग पर रोक लगाना ओर इन चीजों के लिए व्यवसायी से जुर्माना वसूलना एक पक्षीय कार्यवाही नही तो और क्या है।
सभी जानते है कि प्लास्टिक पृथ्वी पर पाया जाने वाला सबसे घातक मानव निर्मित कृत्रिम बस्तु है। ऐसे में प्लास्टिक की उत्पादन पर ही रोक लगा देना चाहिए। परंतु ऐसा ना करके प्लास्टिक की थैली रखने वालो पर जुर्माना लगाना कहाँ तक उचित है।
ये तो वही बात हो गई गुड़ से दोस्ती पर गुड़ से बनी गुलगुले से परहेज।।





